गंगा जमुनी तहजीब को निखारने वाले शायर रघुपति सहाय “फ़िराक गोरखपुरी” की जयंती पर बाराबंकी में कायस्थ फाउंडेशन ट्रस्ट ने किया श्रद्धांजलि कार्यक्रम

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तहलका टुडे टीम

बाराबंकी-लखपेड़ाबाग स्थित कायस्थ फाउंडेशन ट्रस्ट कार्यालय में गंगा जमुनी तहजीब को निखारने वाले पद्मश्री से सम्मानित शायर रघुपति सहाय “फ़िराक़ गोरखपुरी” की जयंती पर उनकी फोटो को माल्यर्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित कर उनकी शख्सियत के बारे में चर्चा की गई।

मालूम हो आज इस शख्सियत के लिये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुबह ट्वीट कर श्रद्धांजलि अर्पित की थी।
कायस्थ फाउंडेशन ट्रस्ट के जिला अध्य्क्ष सदाचारी लाला उमेश चंद्र श्रीवास्तव ने कहा आज मोहर्रम का महीना चल रहा है। गंगा जमुनी तहजीब का पैगाम देने वाले प्रोफेसर रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी साहब ने इस मौके पर कहा था

क्या सिर्फ़ मुसलमान के प्यारे हैं हुसैन
चर्ख़े नौए बशर के तारे हैं हुसैन
इन्सान को बेदार तो हो लेने दो
हर क़ौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन

आज उनकी जयंती पर इमामबाड़ों अज़ाखानो में उनके कलाम की गूंज उनकी श्रद्धांजलि का सबब बन गई है,कई इमामबाड़ों में बैनर लगे है

सदाचारी उमेश श्रीवास्तव ने कहा फिराक गोरखपुरी साहब ने कहा था कि हज़रत इमाम हुसैन अ0 की बुलन्द और पाकीज़ा सीरत महसूस किये जाने की चीज़ है। ऐसे अल्फ़ाज़ का पाना आसान नहीं जो उनके किरदार की अज़मत के मुकम्मल मज़हर हों।

फ़िराक गोरखपुरी साहब ने ये भी कहा था मुझ जैसे गुनाहगार इन्सान के लिये हुसैन अ0 के एख़लाक़ी कमालात की सही क़द्रो क़ीमत का अंदाज़ा लगाना ग़ालेबन अपनी क़ाबिलियत से बढ़ कर जुर्अत आज़माई के मुतरादिफ़ होगा। हुसैन अ0 दुनिया के बङे से बङे ख़ुदा रसीदा ऋषियों और शहीदों के हम पल्ला हैं।

१९२० में नौकरी छोड़ दी तथा स्वराज्य आंदोलन में कूद पड़े तथा डेढ़ वर्ष की जेल की सजा भी काटी।। जेल से छूटने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस के दफ्तर में अवर सचिव की जगह दिला दी। बाद में नेहरू जी के यूरोप चले जाने के बाद अवर सचिव का पद छोड़ दिया। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में १९३० से लेकर १९५९ तक अंग्रेजी के अध्यापक रहे।१९७० में उनकी उर्दू काव्यकृति ‘गुले नग्‍़मा’ पर ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। फिराक जी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में अध्यापक रहे।

उन्हें गुले-नग्मा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड से सम्मानित किया गया। बाद में १९७० में इन्हें साहित्य अकादमी का सदस्य भी मनोनीत कर लिया गया था।फिराक गोरखपुरी को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन १९६८ में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया था।

फिराक गोरखपुरी की शायरी में गुल-ए-नगमा, मश्अल, रूह-ए-कायनात, नग्म-ए-साज, ग़ज़लिस्तान, शेरिस्तान, शबनमिस्तान, रूप, धरती की करवट, गुलबाग, रम्ज व कायनात, चिरागां, शोअला व साज, हजार दास्तान, बज्मे जिन्दगी रंगे शायरी के साथ हिंडोला, जुगनू, नकूश, आधीरात, परछाइयाँ और तरान-ए-इश्क जैसी खूबसूरत नज्में और सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जैसी रुबाइयों की रचना फिराक साहब ने की है। उन्होंने एक उपन्यास साधु और कुटिया और कई कहानियाँ भी लिखी हैं। उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में दस गद्य कृतियां भी प्रकाशित हुई हैं।
फिराक ने अपने साहित्यिक जीवन का श्रीगणेश गजल से किया था। अपने साहित्यिक जीवन में आरंभिक समय में ६ दिसंबर, १९२६ को ब्रिटिश सरकार के राजनैतिक बंदी बनाए गए। उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभर पाए हैं। नजीर अकबराबादी, इल्ताफ हुसैन हाली जैसे जिन कुछ शायरों ने इस रिवायत को तोड़ा है, उनमें एक प्रमुख नाम फिराक गोरखपुरी का भी है। फिराक ने परंपरागत भावबोध और शब्द-भंडार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। उनके यहाँ सामाजिक दुख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर शायरी में ढला है। दैनिक जीवन के कड़वे सच और आने वाले कल के प्रति उम्मीद, दोनों को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़कर फिराक ने अपनी शायरी का अनूठा महल खड़ा किया। फारसी, हिंदी, ब्रजभाषा और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ के कारण उनकी शायरी में भारत की मूल पहचान रच-बस गई है।

इस अवसर पर अमित श्रीवास्तव शुभम श्रीवास्तव अनु
सचिन श्रीवास्तव ,वंश श्रीवास्तव,वेदांत श्रीवास्तव समेत दर्जनों लोग उपस्थित थे

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