हज़रत अब्बास (अ) का शुभ जन्म दिवस 4 शाबान पर खास

धर्म-दर्शन

वे बहुत बहादुर और कृपालू थे। वे संसार के सभी स्वतंत्रता प्रेमियों के लिए नमूनाा हैं। हज़रत अब्बास का व्यक्तित्व इतना महान था कि उनको संसार के अनेक धर्मों के मानने वाले बहुत ही श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। न केवल मुसलमान बल्कि ईसाई धर्म के लोग भी हज़रत अब्बास के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। हज़रत अब्बास से लगाव के बारे में हम एक घटना बताने जा रहे हैं।ईरान के रहने वाले ईसाइयों में से एक ईसाई का बेटा था जो बहुत ही गंभीर बीमारी का शिकार था।  इस ईसाई ने अपने बेटे का इलाज बहुत बड़े-बड़े डाक्टरों से करवाया किंतु उसे कोई लाभ नहीं हुआ।  इस बच्चे को एक ऐसी बीमारी हो गई थी जिसकी वजह से डाक्टरों ने जवाब दे दिया था।  इस बात से ईसाई व्यक्ति बहुत ही दुखी था।  डाक्टरों ने जब से उसके बेटे को लाइलाज बता दिया था तबसे यह व्यक्ति बहुत रोने-धोने लगा था।  एक बार इस ईसाई ने अपने पड़ोसी को अपने बेटे की बीमारी के बारे में बताया।

उसका पड़ोसी, जो मुसलमान था यह सुनकर बहुत दुखी हुआ।  उसने कहा कि तुम निराश न हो।  मैं तुमको एक ऐसी दृष्ती का पता बता रहा हूं जिसने किसी को भी निराश नहीं किया।  मेरी बात मानो तो तुम इमाम हुसैन के भाई हज़रत अब्बास की शरण में जाओ।  उनको “बाबुल हवाएज” अर्थात प्रार्थनाओं के स्वीकार करने वाले के नाम से भी जाना जाता है।  उनके दर से कोई भी ख़ाली नहीं जाता।  तुम भी उनकी शरण में जाओ, मुझको विश्वास है कि तुम वहां से ख़ाली हाथ वापस नहीं आओगे।  देखो मुहर्रम शुरू हो रहा है।  आज मुहर्रम की पहली तारीख़ है।  ईसाई व्यक्ति ने पूरी निष्ठा के साथ हज़रत अब्बास का सहारा लिया।  अपने दोस्त के कहने पर ईसाई ने अपने घर में हज़रत अब्बास की मजलिस रखी।इस मजलिस में बीमार ईसाई बच्चे की मां ने गिड़गिड़ाकर रोते हुए कहा कि मौला, मैं मुसलमान नहीं हूं लेकिन आपकी शरण में आई हूं।  मैंने सुना है कि आप किसी की बात को रद्द नहीं करते और हर मांगने वाले को देते हैं।  मैं आपसे अनुरोध करती हूं कि आप ईश्वर से प्रार्थना करें कि मेरा बेटा ठीक हो जाए।  इस घटना के कुछ समय के बाद ईसाई के बेटे की बीमारी ख़त्म हो गई।  वास्तव में हज़रत अब्बास, ऐसी महान हस्ती हैं जो संसार के सभी स्वतंत्रता प्रेमियों से संबन्धित हैं।  यही कारण है कि सारी दुनिय के लोग उनको मानते हैं।हज़रत अब्बास के शुभ जन्म दिवस के अवसर पर आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं।  शाबान महीने की चार तारीख़ को सन 26 हिजरी में हज़रत अब्बास का जन्म हुआ था।  वे हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सुपुत्र थे।  जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम को जनाबे अब्बास के जन्म की शुभसूचना दी गई तो वे बहुत तेज़ी से घर गए और नवजात को अपनी गोद में लिया।  आपने हज़रत अब्बास के कान में अज़ान दी और उनके बाज़ुओं को चूमा।  आपकी मां का नाम फ़ातेमा केलाबिया था।  वे पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र परिजनों के प्रति गहरी आस्था रखती थीं।

हज़रत अब्बास बहुत शक्तिशाली थे।  उन्होंने अपने पिता हज़रत अली से बहुत कुछ सीखा था।  हज़रत अली जैसे महान व्यक्ति ने अब्बास का उचित प्रशिक्षण किया था।  हज़रत अब्बास ने इमाम अली से शिक्षा प्रााप्त की थी।  वैसे हज़रत अब्बास के व्यक्तित्व पर उनके दो बड़े भाइयों इमाम हसन और इमाम हुसैन का बहुत प्रभाव था।  हज़रत अब्बास की विशेषताओं के बारे में इमाम जाफ़रे सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि हमारे दादा, अब्बास, शक्तिशाली होने के साथ ही साथ बहुत दूरदर्शी भी थे।  उनका ईमान बहुत मज़बूत था।  इतिहास में मिलता है कि बहुत से लोग अपनी ज्ञान संबन्धी बातों को जानने के लिए अब्बास के पास आया करते थे।हज़रत अब्बास, समुद्र में पाए जाने वाले ऐसे मोती के समान थे जिनकी नैतिक विशेषताएं बहुत अधिक थी।  आपकी माता का संबन्ध अरब जगत के एक बहादुर क़बीले से था।  पैग़म्बरे इस्लाम की सुपुत्री हज़रत फ़ातेमा ज़हरा की वफ़ात के बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने भाई अक़ील से कहा था कि वे किसी वीर और बहादुर घराने से उनके लिए ऐसी महिला की तलाश करें जिससे बहादुर बेटा पैदा हो।  कुछ समय के बाद अक़ील ने बनी केलाब क़बीले से फ़ातेमा केलाबिया का चयन किया जो बाद में “उम्मुल बनीन” के नाम से मश्हूर हुईं।  उम्मुल बनीन के चार बेटे थे जिनमें सबसे बड़े हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम थे।  विवाह के बाद उम्मुल बनीन ने इमाम हसन, इमाम हुसैन, हज़रत ज़ैनब और उम्मे कुलसूम को अपने बेटों पर सदैव वरीयता दी।

हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम का लालन-पालन इमाम अली के घर पर हुआ था।  उन्होंने अपने पिता से ज्ञान और शालीनता के साथ ही बहादुरी भी सीखी थी।  आध्यात्मिक दृष्टि से भी हज़रत अब्बास, आध्यात्म के शिखर पर थे।  वे अपने पिता और बड़े भाइयों का विशेष रूप से स्मान किया करते थे।  उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम समय तक अपने बड़े भाई का विशेष सम्मान किया।  उन्होंने जब यह देखा कि उमवियों के हाथों, इस्लाम को नष्ट किया जा रहा है तो इस्लाम की सुरक्षा के लिए वे अपने बड़े भाई इमाम हुसैन के साथ करबला पहुंचे जहां पर इस्लाम की सुरक्षा करते हुए उन्होंने अपने प्राणों की आहूति दी।

हज़रत अली फ़रमाते थे, बाप अपने बेटों को जो बेहतरीन मीरास देते थे, वह गुण और उत्कृष्टता है। अब्बास ने भी अपने पिता से ज्ञान की बड़ी पूंजी हासिल की और उम्र भर अपने भाई इमाम हुसैन की सेवा और मदद की। वे अपने बड़े भाईयों, इमाम हसन और इमाम हुसैन की उपस्थिति में उनकी बिना अमुमति के नहीं बैठते थे और अपनी 34 साल की उम्र में उन्हें पैग़म्बरे इस्लाम के बेटे या अपना स्वामी कहकर संबोधित करते रहे।  हज़रत अब्बास ने मरते दम तक वफ़ादारी की।  हज़रत अब्बास (अ) की वीरता और साहस देखकर लोगों को हज़रत अली की वीरता याद आ जाती थी। वे युवा अवस्था से ही अपने पिता हज़रत अली (अ) के साथ कठिन और भयानक अवसरों पर उपस्थित रहे और इस्लाम की रक्षा की। दुश्मनों के साथ युद्ध में आपकी बहादुरी देखने योग्य होती थी। इतिहास ने सिफ़्फ़ीन युद्ध में हज़रत अब्बास की वीरता के दृश्यों को दर्ज किया है।

हज़रत अब्बास पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से मुहब्बत करने वाली एक आदर्श हस्ती थे। वे अपने समय के इमामों का पूर्ण रूप से अनुसरण करते थे और उनके आज्ञाकारी थे।  हज़रत अब्बास (अ) ने आख़िरी दम तक अपने इमाम का पूर्ण समर्थन किया और उनके दुश्मनों से डटकर मुक़ाबला किया। उन्होंने अपने पिता की शहादत के बाद, अपने भाईयों इमाम हसन और इमाम हुसैन की सहायता में पूरी शक्ति लगा दी। वे कभी भी उनसे आगे नहीं बढ़े और कभी भी अपने बड़े भाइयों की किसी बात को नहीं टाला।

हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम ईश्वर पर अत्याधिक ईमान रखने वाले व्यक्ति थे।  इस ईमान के लक्षण उनके विशेष व्यवहार में दिखाई देते थे।  हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम के आध्यात्मिक स्थान व ज्ञान के बारे में इतिहास में आया है कि वे अत्याधिक धार्मिक तथा पवित्र स्वभाव के थे।  लोग उनपर अत्याधिक विश्वास करते थे। सब लोग उन्हें भलाई व उपकार करने वाले के रूप में जानते थे। उनका मधुर स्वभाव, लोगों को अपनी ओर खींच लेता था। हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम की दूरदर्शिता व ज्ञान इस बात का कारण था कि लोग अपने कामों में उनसे सलाह लिया करते थे। वे लोगों के ज्ञान संबंधी प्रश्नों का उत्तर देते थे। उनका इस्लामी ज्ञान अत्याधिक व्यापक था। लोगों की सहायता करना और उनकी समस्याओं का निवारण हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम की महत्वपूर्ण दिनचर्या थी। इसीलिए उन्हें बाबुल हवाएज अर्थात आवश्यकताओं की पूर्ति का द्वार कहा जाता है। अर्थात वे एसे व्यक्ति थे जो दूसरों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।

हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम अत्याधिक विनम्र और शिष्ट थे। उनका शिष्ट व संयमपूर्ण व्यक्तित्व हज़रत अली अलैहिस्सलाम के इस कथन की याद दिलाता था कि शिष्टाचार से बड़ी कोई विरासत नहीं होती। वे अपने भाई इमाम हसन व इमाम हुसैन अलैहिमुस्सलाम के सेवा में बिना उनकी अनुमति के कभी बैठते नहीं थे उन्होंने अपनी ३४ वर्ष की आयु में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को, जो उनके भाई थे, पैग़म्बरे इस्लाम के पुत्र और स्वामी कहकर संबोधित किया।  त्याग व बलिदान, हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम के व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण एवं स्पष्ट आयाम है जिसकी चरमसीमा का प्रदर्शन उन्होंने कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महान आन्दोलन के दौरान किया। इस प्रकार आशूरा की महान घटना में हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम का नाम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के नाम के साथ जुड़ गया।  करबला में हज़रत अब्बास के महान बलिदान और साहस की घटना को घटे हुए शताब्दियां व्यतीत हो चुकी हैं किंतु इतिहास अब भी अब्बास इब्ने अली की विशेषताओं से सुसज्जित है। यही कारण है कि शताब्दियां बीत  जाने के बावजूद वास्तविक्ता की खोज में लगी पीढ़ियों के सामने अब भी हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम का व्यक्तित्व दमक रहा है।

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