सुप्रीम कोर्ट के 5 जज हुए पागल भारत मे सभी धर्मो मे पाबंदी के बाद भी बेहियाई बेहूदगी को बढाने और आज़ाबे खुदा को पाने के लिये समलैंगिक वयस्कों के रजामंदी से संबंध को अपराध नहीं का दिया बड़ा फैसला ,हर तरफ निंदा 157 साल पुरानी धारा 377 पर आया अहमकाना फैसला

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तहलका टुडे टीम/रिज़वान मुस्तफ़ा
दिल्ली-समलैंगिक यौनक्रिया या गे सैक्स उसे कहते हैं जब समान लिंग के लोगों के बीच यौन संबंध हों, चाहे वे दो या दो से अधिक पुरुष हों या महिलाएँ।
बहुत से धर्म समलैंगिक यौनक्रिया को पाप मानते हैं, जिसमें हिन्दू, इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्म भी हैं। यद्यपि इन धर्मों के कुछ सांप्रदायों में, मुख्यतः ईसाइयत और यहूदियत में अब समलैंगिकता को स्वीकार किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने 17 जुलाई को इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रखा

चीफ जस्टिस के नेतृत्व में पांच जजों की बेंच ने फैसला सुनाया
केंद्र ने धारा 377 पर अपना पक्ष रखने से इनकार किया था
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (अाईपीसी) की धारा 377 के एक हिस्से को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। आईपीसी में 1861 में शामिल की गई धारा 377 समान लिंग वालों के बीच शारीरिक संबंधों को अपराध मानती थी। इसमें 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान था। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपने फैसले में कहा कि दो बालिग एकांत में आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं तो वह अपराध नहीं माना जाएगा। लेकिन बच्चों या पशुओं के साथ इस तरह के रिश्ते अपराध की श्रेणी में बरकरार रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
1) चीफ जस्टिक दीपक मिश्रा, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि समलैंगिक समुदाय को भी आम नागरिकों के बराबर अधिकार हासिल हैं।
2) बेंच ने कहा- ‘‘एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना सर्वोच्च मानवता है। समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखना बेतुका है। इसका बचाव नहीं किया जा सकता।’’
3) ‘‘इतिहास को लेस्बियन, गे, बायसेक्शुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) समुदाय को वर्षों तक पीड़ा, कलंक और डर के साए में रखने के लिए माफी मांगनी चाहिए।’’
4) ‘‘जजों ने कहा कि दूसरों की पहचान को स्वीकार करने के मामले में नजरिया और मानिसकता बदलनी चाहिए। लोगों को कैसा होना चाहिए, इस नजरिए की बजाय लोग जैसे हैं, उन्हें वैसे ही स्वीकार करने की मानसिकता होनी चाहिए।’’

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा था : आईपीसी की धारा 377 की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2009 में इस पर फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने दो वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। तब सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 के तहत समलैंगिकता को दोबारा अपराध करार दिया था।

केंद्र ने मामले से खुद को अलग किया था : इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र ने धारा 377 पर अपना पक्ष रखने से इनकार कर दिया था। सरकार का कहना था कि यह कोर्ट ही तय करे कि धारा 377 के तहत बालिगों का समलैंगिक संबंध बनाना अपराध है या नहीं? हालांकि, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि समलैंगिक विवाह, संपत्ति और पैतृक अधिकारों जैसे मुद्दों पर विचार न किया जाए, क्योंकि इसके कई विपरीत परिणाम भी सामने आ सकते हैं।
हिन्दुस्तान मे इस बेहियाई को रोकने के लिये हर धर्म मे पाबंदी हैं।
इसको लेकर धार्मिक गुरुओ मे गुस्सा हैं।
और वो राष्ट्रपति से इस कानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

समलैंगिकता शब्द उन लोगो के लिए प्रयुक्त होता है जो रोमांस रूप से समान लिंग के लोगों के प्रति आकर्षित होते हैं, लेकिन इसकी अन्य परिभाषाएँ भी हैं। यदि कोई समलैंगिकता को इस अर्थ में लेता है कि यह शब्द केवल उन लोगो के लिए प्रयुक्त होता है जो समान लिंग के लोगों के प्रति आकर्षित होते हैं, तब इस परिभाषा के अनुसार कहीं अधिक लोग समलैंगिक होंगे बजाय कि यदि कोई समलैंगिकता का अर्थ केवल यह समझता हो जिसमें दो समानलिंगी लोगों के आपसी यौन-संबंध है। आमतौर पर, यह शब्द उन सभी लोगों के लिए प्रयुक्त होता है, जो समान लिंग के प्रति आकर्षित होते है, उनके लिए भी जिनका अभी तक समलैंगिक यौन-संबंध नहीं हैं (अभी तक)। बहरहाल, समलैंगिकता का सबसे दिखाई देने वाला रूप वास्तविक संबंध है। प्राचीन संस्कृतियों में समलैंगिकता के संबंध में सर्वाधिक प्रमाण उन चित्रकारियों से प्राप्त होते है, जिसमें दो पुरुषों को अंतरंग संबंध या यौन-क्रिया में दिखाया गया है।

कुछ लोग होमोफ़ाइल (युनानी शब्द όμος (“होमोस”; अर्थात समान) और φιλεῖν (“फ़िलीन”; अर्थात प्यार करना)) शब्द का भी उपयोग करते हैं। यह शब्द आमतौर पर एक “विनम्र” शब्द है। यह आमतौर पर उन लोगों के लिए प्रयुक्त होता है जो केवल अपने लिंग के लोगों के प्रति आकर्षित होते हैं, पर जिनके समलैंगिक संबंध नहीं है या वो समर्थ नहीं हैं।

समलैंगिकों के लिए बहुत से शब्द प्रयुक्त होते हैं। इनमें से कुछ का उपयोग समलैंगिकों को अपमानित करने के लिए किया जाता है। हालांकि एल॰जी॰बी॰टी समुदाय कभी-कभी स्वयं को वर्णित करने के लिए इन शब्दों का उपयोग करता है। यह इन शब्दों को कम कष्टकारी बनाने के लिए किया जाता है। समलैंगिक पुरुषों के लिए प्रयुक्त होने वाले कुछ शब्द हैं गे और क्वीर। समलैंगिक महिलाओं के लिए प्रयुक्त होने वाले कुछ शब्द हैं लैस्बियन और डाइक। लैस्बियन शब्द का अधिकांशतः उपयोग किया जाता है। डाइक कम उपयोग में आने वाला शब्द है, जो कभी-कभी उन लैस्बियनों के लिए प्रयुक्त होता है, जो अधिक पुरुषों जैसी होती हैं (पुरुषों के समान कपड़े पहनना या व्यवहार करना)।

 

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